Search This Blog

Friday, June 27, 2008

Live Freely

Here I sit at work, bored and alone
it's times like these I could use a clone.
I'd be off to the ocean or some place warm
not looking back or thinking of home.
I'd find me a tall palm tree, and sit at it's trunk
with a drink in my hand.... trying to get drunk.
I'd sip the day away in the warm tropical sun
and get up occasionally for a bit of carribean fun.
I'd roam the island on my white stud of a horse
not forgetting to take my tall, foofy drink, of course.
I'd gallop the ocean side and kick up some sand,
then trot toward the sound of a steel drum band.
I'd be dancing the night away with some local girl
twisting and spinning... and trying not to hurl.
When the night is over I'd nest a place on the beach
feel the sea mist in my hair and taste the salt on my teeth.
What a dream come true, if at least just for me,
To feel really alive and living so free.

आज का भारत

जब कब्र में भी बच्चे भूख से दूध दूध चिल्लाते हैं,
माँ की हड्डी से चिपक ठिठुर जाडों की रात बिताते हैं,
कालदूत जब अकाल बन धरती को खा जाता है,
मुठ्ठी भर अनाज के लिए जब मार-काट हो जाता है,

जिस्म चीर जब सूखी हड्डियां भूख की दास्तान सुनाती है,
मौत भी जब इंसान के लिए वरदान सी बन जाती है,
एक बूँद दवा जब खून से सौदा करने लगती है,
रोते-रोते जब नम आँखें भी मरुभूमि बनने लगती है,

युवती की लज्जा-शर्म बेच, जब ब्याज चुकाए जाते हैं,
चांदी के कुछ सिक्कों तले उनकी आवाज़ चींखती पुकारती दब जाती है।
प्यालों में डूब जब रिश्ते-नाते भुला दिए जाते हैं,
बीवी की जगह तब बेटियों से प्यास भुझाये जातें हैं।

तन पे एक सूती डोर चढ़ जाए ये सोच, जब अबला हाथ उठाती है,
वासना की वह अनंत भूख, क्षण-भर में उन्हें खा जाती है।
बहनों की इज्ज़त जब सरे बाज़ार लुट जाती है,
सारे भाई सर झुकाए तमाशा देख रह जाते हैं।

फुटपाथों पे खड़े जब प्रजातंत्र ने दी सभ्यता को पुकार,
मुह छुपाये सभ्यता भाग पड़ी, चींखती पुकारती करती हाहाकार। 
शर्म से शरमाकर जब संस्कृति छोड़ जाए समाज का दामन,
पापी महलों का आँगन तब देता मुझको आमंत्रण। 

माफिया के नेताओं ने मचाई लूट अपहरण क्लेश,
हाथ दलालों के बिका गांधी तेरा देश।
कहीं गरीबी भुकमरी, कहीं पे हाहाकार,
संशय घर कहीं मिले खुशियों के त्यौहार।

जो लोग बजाते रह गए प्रजातंत्र की ढोल,
उनकी भाषा को नही मिले यहाँ पर बोल। 
देवलोक में कैद है सुख सुविधा के मन्त्र,
सड़क किनारे पड़ा हुआ है भूखा एक जनतंत्र। 
यह इंसानों की खुशियाँ स्वर्गलोक में छिपाए जाते हैं,
हटो वियोग के मेघ पंथ से, स्वर्ग लूटने हम आतें हैं॥

The long hard way

I’m not a star, 
There’s no halo over my head. 
Rather, am a defeated person, 
With the abyss of darkness all my way.
Fate doesn’t like the color of my eyes. 
Struggle and strife are old friends of mine, 
I like odds, Especially when they are stacked against me. 
Because there will be a day, 
When I’ll be at zenith And stare them in the eye. 
I know the more I sweat More will I shine… 
I’ll survive the sinking Titanics And ruined Hiroshimas. 
I’ll emerge like a phoenix from my ashes. 
I’m the guy who will have Courtyard of success at my doorstep someday 
And that is the day, When I’ll fear no fear And will taste the sweat that is sweet. 
And then… Look back for the first time And say… 
I did it my way. The long hard way.

Melancholy Strain

While traveling in the shady haunt Among the Arabian sands
Far from the tumultuous world Lonely, in my dreamland. 
Suddenly in that solitude, Where no nightingale did ever chant 
I heard somebody singing a melancholy strain 
Breaking the silence of the seas. 
The maiden sang and sang and sang… 
As if her song could have no ending. 
I listened motionless and still 
As I mounted up a hill 
And was about to accompany her 
I was suddenly pulled down 
By that unpleasant alarm. 
The music, which in my heart I bore 
Was heard no more. 
Oh! How fleet is the glance of mind 
Compared to the speed of light. 
The tempest itself lags behind. 
I saw the start of another boring a routined morning. 
The day begin with full enthusiasm 
To crucify me with that heavy school bag 
Those typical formulas, equations and chemical formulas. 
Forgetting that ephemeral dream 
I awoke to suffer the pangs of my existence.

गीतांजलि

मेरे इस काव्य की प्रेरणा हो तुम, 
मेरे लघु जीवन की आराधना हो तुम, 
मेरे मन में बसे चित्र की कल्पना हो तुम, 
एक खूबसूरत सपना ही सही, मेरा अपना हो तुम। 

 चुपके से तुम ख्यालों में आती हो, 
दिल में हलचल मचा कर कहीं लुप्त हो जाती हो, 
यह ज्ञात नही मुझको तुम फूल हो या कलि, 
फिर भी तुम्ही को अंकित है यह मेरी गीतांजलि। 

 आशा ही नही यह प्रबल विश्वास है मेरा, 
स्वीकार कर इस काव्य को सफल करोगी जन्म मेरा, 
बहुत सता चुकी हो अब तो प्रत्यक्ष हो जाओ, 
मेरे अब तक के तप का कुछ तो फल देती जाओ॥